अनुसंधान उपलब्धियां

अनुसंधान उपलब्धियाँ

 केन्द्र ने पिछले 13 वर्षो में योजनाबद्व तरीके से किस्मों के संग्रहण (52), तकनीकों के विकास (10), गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री का विकास (1.5 लाख), के साथ-साथ राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की अनेक परियोजनाओं के द्वारा लीची तथा अन्य फल फसलों पर महत्वपूर्ण ज्ञान-कौशल का विकास किया है । केन्द्र के वैज्ञानिकों ने अपने-अपने परियोजना क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य किये हैं और यह प्रयास अनवरत रुप से जारी है । वैज्ञानिकों तथा क्षेत्र के लीची उत्पादक किसानों के परस्पर सहयोग से लीची के क्षेत्रफल एवं उत्पादन में बढ़ोत्तरी हुई है तथा गुणवत्ता में सुधार हुआ है । लीची में अनेक प्रकार से मूल्य सम्बर्धन द्वारा नुकसान के प्रतिशत में कमी आई है। केन्द्र की कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियों में, जननद्रव्यों का संग्रहण, अध्ययन, किस्म सुधार, मधुमक्खी का लीची उत्पादन में सहभागिता, नई पौध प्रवर्द्धन तकनीकी, छत्रक प्रबंधन, पुराने बागो का जीर्णोद्धार, अन्तर्वर्ती फसलें, फलों का दैहिक विकारों से रोकथाम, नाशीकीट एवं रोग प्रबंधन, जैविक जीवनाशी क विकास और प्रयोग, परिपक्वता मानकों का मानकीकरण, तुड़ाई उपरान्त क्षति रोकने हेतु प्रबंधन एवं मूल्यवर्द्धित पदार्थों का विकास प्रमुख है।   इनमें से कुछ का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है:

जननद्रव्य प्रबंध एवं फसल सुधार

 लीची के जननद्रव्य आधार, फलों की गुणवत्ता, फलों की उपलब्धता अवधि विस्तार आदि हेतु लीची के 52 जननद्रव्य फील्ड जीन बैंक में स्थापित किये जा चुके है। उच्चगुणवत्ता के लीची के ५६ पौधों (क्लोन) का चयन एवं फील्ड जीन बैंक में स्थापना तथा मूल्यांकन चल रहा है । लीची के 20 जननद्रव्यों के आणविक चरित्रों का प्रतिरूपण केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनउ के साथ मिलकर किया गया जिसके माध्यम से लीची के विभिन्न किस्मों के नामकरण को लेकर विसंगतियों को दूर किया गया । इससे यह पाया गया कि कस्बा, मंदराजी, लेटलार्ज रेड, योगदा सलेक्सन और सीडलेस लेट किस्मों में अनेक विशिष्ट लक्षण है जिनका उपयोग भविष्य में फसल सुधार कार्यक्रमों में किया जा सकता है। शाही, चाइना, तथा बेदाना के आपसी संकरण का कार्यक्रम जारी है । इसी के साथ-साथ अनेक राज्यों से प्राप्त फलों से पौधों को पौधशाला में उगाकर राज्यवार जैव-विविधता के आकलन का प्रयास किया गया । लीची के प्राकृतिक संकरण को ध्यान में रखते हुए लाभदायक औजपूर्ण जीन का पता लगाने के लिए 26 संभावित प्राकृतिक संकरों को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी क्षेत्र के शोध परिसर के रॉची उपकेन्द्र से मंगाकर पौधशाला में उनके पौधों को लगाया गया ।

फसल उत्पादन

पौधशाला में 90% से ज्यादा पौधों की स्थापना-दर की तकनीक विकसित की गयी । लीची के शाही किस्म के पौधों में 75: 50: 75 ग्राम एन.पी.के. प्रति पौधा प्रति वर्ष देने से पौधों की वृद्धि तथा तने की मोटाई एवं क्षत्रक के फैलाव में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी देखी गयी । इसी प्रकार लीची के शाही किस्म के पौधों में 20 कि.गा. गोबर की सड़ी खाद + 2 किग्रा. वर्मीकम्पोस्ट +1 किग्रा. नीम की खल्ली + जैविक खाद के प्रति वृक्ष प्रति वर्ष के दर से प्रयोग करने से पौधों की वृद्धि एवं विकास अच्छी हुई । उच्च घनत्व बागवानी के अन्तर्गत यह पाया गया कि छः वर्षो के पश्चात् मध्यम सघनता वाले पौधों (6×4 मी. और 4×4 मी.) में स्पष्ट रुप से अधिक वृद्धि पायी गयी । लीची आधारित फसल पद्धति मॉडल का विकास किया गया जिसका उद्देश्य पौधों के बीच के खाली स्थान को कम दिन वाली फसलों को लगाकर उपयोग करना, जिनका कि पौधों की वृद्धि एवं जड़ों की वृद्धि पर अनुकूल प्रभाव हो, का विकास किया गया । फसल के दो मॉडल बलुई दोमट मिट्टी के लिए इस प्रकार हैं:  मॉडल I:  लीची + 2 पंक्ति केला (एक मुख्य + पेड़ी की फसल), मॉडल II:  लीची + नगदी फसल (80 प्रतिशत खाली स्थान के लिए) (फसलक्रम: भिण्डी-ग्लेडियोलस, लोबिया-आलू,  प्याज, लोबिया-फ्रेचबीन-भिण्डी) । फल के गुच्छे का थैली में रखने की तकनीक, जिसके लिए छिद्रयुक्त उजला बटर पेपर (मक्खन सहित कागज) या भूरा पेपर बैग का प्रयोग फल के विकास अवस्था में किया जाता है। थैले के प्रयोग करने से रंग में सुधार, गुणवत्तापूर्ण मानक फलों की उपलब्धता तथा फल फटन, झुलसन एवं फल बेधक कीट का प्रकोप कम पाया गया । लीची के अनुत्पादित बागों का जीर्णोद्धार तकनीक का विकास किया गया जिसमे लीची के पुराने पौधों को 2.5 मी. की उॅचाई पर काटने और उनमें प्रत्येक मुख्य शाखा पर चार शाखाओं को विकसित होने देने पर सबसे अच्छा क्षत्रक का विकास हुआ और जीर्णोद्धार तकनीकी अपनाकर कम समय (4-5 साल) एवं खर्च में गुणवत्तायुक्त उत्पादन किया जा सका । जुलाई और अगस्त माह में निकलने वाले प्राकृतिक कल्लों में सबसे अधिक शुद्ध मंजर और फूल निकले और उनमें फल विकास भी सबसे अधिक पाया गया । लीची के बगीचे में माइकोराइजा के अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि लीची के जड़ों के पास स्थानीय अरबसकुलर माइकोराइजा कवक की ग्लोमस प्रजाति प्रत्येक जगह पर प्रमुखता से मिली । लीची के साथ परस्परिक सहजीवी माइकोराइजा कि प्रजाति कि पहचान कर ली गयी है ।

पौध स्वास्थ्य प्रबंध

लीची के बगीचों के सर्वेक्षण में यह पाया गया कि फल तथा बीज बेधक, माइट, तना बेधक, पत्ती सुरंगक, पत्ती मोडक तथा छाल खाने वाले गिड प्रमुखता से लीची के पोघों को नुकसान पहुचाते है। फल एवं बीज बेधक लीची का एक प्रमुख नाशीकीट है। अकेले कोनोपोमोर्फा की 2-3 प्रजातियां लीची फल को काफी नुकसान पहुँचाती है। एकीकृत नाशीजीव प्रबन्ध जैसे फेरोमोन ट्रैप (12-15/ट्रैप/है.) के बगीचे में बाग के मध्य ऊचाई (10-15 फीट) पर प्रयोग, ट्राईकोगामा कीटनाशी के 50,000 अण्डों को ट्राईकोकार्ड की सहायता से बाग में मंजर/फूल निकलने के पहले लगाना, वर्मीवाश (5 प्रतिशत),  नीम तेल (4 मिली/ली नीम आधारित रसायन का प्रयोग) उत्पादक द्वारा फल बेधक कीट के बचाव के उपयुक्त पाया गाय । रोगो में, पत्ती एवं मंजर झुलसा प्रमुख पाया गया और इसके प्रबंधन के लिए क्लोरोथलोनिल एवं डिफेंकोनाज़ोल का छिड़काव प्रभावी पाया गया। केंद्र ने लीची के विल्ट (सूखा रोग) के प्रबंधन लिए प्रभावी ट्राइकोडर्मा स्ट्रेन और क्षेत्र स्तर पर इसके प्रयोग की  तकनीकी विकसित की है ।

तुड़ाई उपरान्त फल प्रबन्ध तथा मूल्य संवर्धन

 लीची के फलो में तुड़ाई के पश्चात् ग्राहक तक पहुँचने के वितरण श्रींखला में विभिन्न चरणों में होनेवाले  नुकसान के आंकलन में यह पाया कि कृषक के खेत पर सूर्य के विकिरण से झुलसने, फलों के फटने तथा तुड़ाई के समय यांत्रिक नुकसान से ज्यादा क्षति होती है।  रीटेल लेवल में जीवजनित फल सड़न (रोटिंग) प्रमुख कारक पाई गयी । लीची के फलों की ताजगी एवं गुणवत्ता ज्यादा दिनों तक बरकरार रखने की तकनीक का विकास किया गया । परम्परागत तरीके से लकड़ी के बक्सों में भरे गये फल और कागज के सात प्लाई के डिब्बों में भरे गयेफलों के तुलनात्मक अध्ययन में यह पाया गया कि दिल्ली के बाजार में पहुँचते –पहुँचते कागज के बक्सों में नुकसान प्रतिशत लकड़ी के बक्सों कि अपेक्षा कम पाया गया । लीची से निर्मित विभिन्न प्रसंस्कृत पदार्थों जैसे लीची वाइन,  लीची नट, रसगुल्ला आदि की भी तकनीक विकसित की गई।

वाह्य-वित्त पोषित परियोजनाएँ

खाद्य एवं कृषि संगठन परियोजना के तत्वावधान में नई किस्मों में ताई सो, क्वाई मी, सुटॉंग तथा वाई माई पिंक किस्में स्पेन से मंगाई गई परन्तु इनकी वृद्वि बहुत ही धीमी है । वायोडायवर्सिटी (संयुक्त राष्ट्र संघ पर्यावरण कार्यक्रम – वैश्विक पर्यावरण कोष) परियोजना के अन्तर्गत सर्वेक्षण से आम के 28 जननद्रव्यों के भौतिक तथा रासायनिक चरित्रों का प्रतिरूपण किया गया। विगत वर्षो में चिन्हित किये गये आम और गागर नींबू के क्रमशः 4 और 7 क्लोन से 300 एवं 450 कलमी पौधे तैयार किये गये। लीची के उपचारित बगीचों में ट्राइकोडर्मा तथा एजोटोवैक्टर की संख्या बढ़ते हुए क्रम में पायी गयी तथा माइकोराइजा सम्प्रषित पौधों की जड़ों में उनके विकास को देखा गया। केन्द्र पर बायोटेक्नालजी विभाग द्वारा वित्तपोषित परियोजना (आम का राष्ट्रीय विकास) का शुभारम्भ हुआ जिसमें बिहार राज्य के विभिन्न प्रखण्डों में आम की पायी जाने वाली प्रजातियों, उनसे संबंधित परम्परागत ज्ञान, उपयोग आधारित आंकड़े, उत्पादन एवं  तुड़ाई-उपरान्त फल सम्भलाव की सम्पूर्ण जानकारी को एकत्रित करने का काम किया गया। चक्रीय कोष योजना के अन्तर्गत पर्याप्त मात्रा में पोधों को बनाने का प्रयास किया गया तथा शाही और चायना किस्म के कुल 2,00,000 पौधों  को विभिन्न इकाइयों को उपलब्ध कराया गया।